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यूँ तो काफी दिनों से लिखता रहा हूँ ।किशोरावस्था के अपरिपक्व लेखन के बाद जब धीरे–धीरे समझ आने लगी तो रोजी–रोटी के चक्कर में गृहजनपद छोड़ना पड़ा ।बलिया में वैसे भी बहुत कम रहा हूँ । पहले पढ़ाई–लिखाई फैजाबाद से की फिर डिप्लोमा करने वापस बलिया आ गया । बलिया शहर में रहते हुए साहित्यिक लोगों से मुलाक़ात का क्रम स्व0 नरेन्द्र शास्त्री जी से शुरू हुआ जो उनके बाद भी तीन चार सालों तक चलता रहा, फिर नौकरी के सिलसिले में दिल्ली आना पड़ा ।यहाँ आने के बाद साहित्य से ऐसा कटा कि फिर कुछ किताबें पढ़ने और टेलीविजन पर कविताएं सुनने तक ही सीमित रह गया ।सिविल इन्जीनियरिंग के साथ साहित्य की पटरी वैसे भी कम बैठती है ।
इधर लिखना तो चलता रहा किन्तु निरन्तरता और परिमार्जन का अभाव मन के अन्दर कुछ मथता सा रहा ।जैसे किसी कलाकार को तब तक चैन नहीं मिलता जब तक किसी को अपनी कलाकृति दिखा न , दे उसी तरह मैं भी बेचैन था ।ऐसा नहीं कि कोई पाठक नहीं मिला या कोई श्रोता नहीं मिला,, बस वो सिलसिला नहीं मिला जो मन को सुकून दे सके ।कई बार रचनाएं पत्र–पत्रिकाओं में भेजी और कई बार प्रकाशित भी, हुईं लेकिन प्रतिक्रियाओं के अभाव में उत्साह कुलांचे नहीं भर सका ।
अचानक एक दिन किसी आत्मीय ने मुझसे अपना ब्लाग लिखने को कहा तो बात जँच गयी और झटपट अपना भी एक ब्लाग बना डाला। श्रोता तो नहीं,,, हाँ, पाठक तलाशने की कोशिश मुझे इस मंच तक जरूर ले आयी ।आशा थी कि कुछ प्रोत्साहन मिलेगा और रचनाशीलता आागे बढ़ेगी ।
अब जब ब्लाग लिखना शुरू किया है तो पता लग रहा है कि हिन्दी टाइप करना कितना मुश्किल है ।एक तो नौसिखिया ब्लागर, ऊपर से बहुत दिनों बाद बैठकर लिखना,, बस जो भी कच्चा–पक्का बन जाए चखिएगा जरूर। आज के लिए बस इतना ही ।
अभिवादन सहित आपका –
विजय प्रताप

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