पंख फड़फड़ाता हूँ

जब भी खुद के करीब आता हूँ
पंख मैं खूब फड़फड़ाता हूँ

कॊन जाएगा उंगलियाँ थामे
राह चलते मैं डगमगाता हूँ

शाम होते ही अपनी मंज़िल की
आज भी राह भूल जाता हूं

भीड़ के बीच भी रहा तनहा
जाने किससे मैं ख़ॊफ खाता हूँ

साथ जिनके मैं बैठता-उठता
बात करता हूँ सकपकाता हूँ

हर गली, हर शहर- नुमाइश है
मैं ही अहमक हूँ जो छुपाता हूँ

सवाल उठाती है ज़िन्दगी

उनके ही तख़्तो-ताज सजाती है ज़िन्दग़ी
जिनके हजारों नाज उठाती है ज़िन्दगी

जिन्दा हूं मैं, सुकून भी है शहर-ए-यार में
फिर भी कई सवाल उठाती है ज़िन्दगी

तेरे शहर में आज भी ख़ानाबदोश हूं
वैसे बड़े मकान बनाती है ज़िन्दगी

उनकी नजर पड़ी तो शहंशाह हो गया
वरना फ़क़त उधार चुकाती है ज़िन्दगी

लोगों के ऐतबार का शायद सवाल था
वरना कहाँ हिसाब चुकाती है ज़िन्दगी

यह जिन्न भी चिराग से निकलेगा एक दिन
वादों की अब मियाद बढ़ाती है ज़िन्दग़ी

कुछ कमाल होने दो

आज फिर कुछ कमाल होने दो
दर्द को बेमिसाल होने दो

पैरोकारी कमाल की उनकी
मुल्जिमों को बहाल होने दो

बेताल कब तक डाल पर होगा
विक्रमों से सवाल होने दो

पांव उनके जमीन पर होंगे
जीत को चार साल होने दो

जनता कब जनार्दन होगी
हुजूर से यह सवाल होने दो

वक्त सा हुनर दे दो

मेरी यादों को इक सफर दे दो
फिर कोई दर्द मुख्तसर दे दो

कुछ चिराग़ों ने सर उठाया है
फिर हवाओं को ये ख़बर दे दो

थक चुका हूँ मैं दर–ब–दर होते
अब तो अपना सा एक घर दे दो

जख्म सारे जहाँ के भर पाऊँ
मुझको भी वक्त सा हुनर दे दो

कोइ बीमार अब न हो ‘आँसू’
बस दुआओं में ये असर दे दो

चुपके-चुपके मैं बहता हूं

चुपके-चुपके मैं बहता हूं ।
अंदर-अंदर दर्द समन्दर
उथल-पुथल होता रहता हूं।

कई ऋणों के बोझ तले मैं बाधाओं से गले मिला हूं
मंदिर-मंदिर निर्वासन था जंगल-जंगल पांव छिला हूं
कर्तव्यों की शर शय्या पर
पड़ा-पड़ा रिसता रहता हूं।

कुछ गुब्बारे उत्सवधर्मी कुछ के नाम वही बेशर्मी
संसाधन तो सहमे सिकुड़े पर इच्छाओं की हठधर्मी
खुद से खुद ही बातें करता
थोड़ा गुमसुम सा रहता हूं।

मैं तो समझूं पीर-पराई रोग-व्याधियों की पहुनाई
संबंधों के बियाबान में साथ खड़ी केवल परछाई
फिर भी उनकी बारहखड़ियां
थोड़ी कही बहुत सुनता हूं।

इनकी, उनकी, सबकी बातें आंखों-अखों कटती रातें
करवट-करवट खालीपन है सलवट-सलवट गहरी सांसें
चेहरे पर झीनी,झूठी सी
मुस्काने अोढ़े फिरता हूं।