Category Archives: ग़ज़ल

पंख फड़फड़ाता हूँ

जब भी खुद के करीब आता हूँ
पंख मैं खूब फड़फड़ाता हूँ

कॊन जाएगा उंगलियाँ थामे
राह चलते मैं डगमगाता हूँ

शाम होते ही अपनी मंज़िल की
आज भी राह भूल जाता हूं

भीड़ के बीच भी रहा तनहा
जाने किससे मैं ख़ॊफ खाता हूँ

साथ जिनके मैं बैठता-उठता
बात करता हूँ सकपकाता हूँ

हर गली, हर शहर- नुमाइश है
मैं ही अहमक हूँ जो छुपाता हूँ

सवाल उठाती है ज़िन्दगी

उनके ही तख़्तो-ताज सजाती है ज़िन्दग़ी
जिनके हजारों नाज उठाती है ज़िन्दगी

जिन्दा हूं मैं, सुकून भी है शहर-ए-यार में
फिर भी कई सवाल उठाती है ज़िन्दगी

तेरे शहर में आज भी ख़ानाबदोश हूं
वैसे बड़े मकान बनाती है ज़िन्दगी

उनकी नजर पड़ी तो शहंशाह हो गया
वरना फ़क़त उधार चुकाती है ज़िन्दगी

लोगों के ऐतबार का शायद सवाल था
वरना कहाँ हिसाब चुकाती है ज़िन्दगी

यह जिन्न भी चिराग से निकलेगा एक दिन
वादों की अब मियाद बढ़ाती है ज़िन्दग़ी

कुछ कमाल होने दो

आज फिर कुछ कमाल होने दो
दर्द को बेमिसाल होने दो

पैरोकारी कमाल की उनकी
मुल्जिमों को बहाल होने दो

बेताल कब तक डाल पर होगा
विक्रमों से सवाल होने दो

पांव उनके जमीन पर होंगे
जीत को चार साल होने दो

जनता कब जनार्दन होगी
हुजूर से यह सवाल होने दो

वक्त सा हुनर दे दो

मेरी यादों को इक सफर दे दो
फिर कोई दर्द मुख्तसर दे दो

कुछ चिराग़ों ने सर उठाया है
फिर हवाओं को ये ख़बर दे दो

थक चुका हूँ मैं दर–ब–दर होते
अब तो अपना सा एक घर दे दो

जख्म सारे जहाँ के भर पाऊँ
मुझको भी वक्त सा हुनर दे दो

कोइ बीमार अब न हो ‘आँसू’
बस दुआओं में ये असर दे दो

आदतें उनकी पुलिसिया

प्रश्न जब बहुरूपिया महसूसिए
आप उत्तर भेदिये सा दीजिए

जब दिये का तेल चुकने जा रहा हो
जुगनुओं से मुठ्ठियाँ भर लीजिए

आदतें उनकी पुलिसिया हो गईं
आप हिम्मत मीडिया सी कीजिए

आपने हर पेज पर परदा लिखा
हाशियों को झाँकने भी दीजिए

आपकी चुप्पी भुनाई जाएगी
वक्त रहते मुठ्ठियाँ कस लीजिए

रहनुमाओं पर भरोसा कर चुके
अब हमें कुछ और करने दीजिए