Category Archives: ग़ज़ल

हवा से बाख़बर होना

इसे तुम अफसरी कह लो या मेरा घरबदर होना
कहाँ आसान होता है हवा से बाख़बर होना

जरा थम कर बयाबां में हक़ीकत को बयां करना
कि महसूसा है मैंने क़ातिलों का हमसफर होना

न धरती पर, न चेहरों पर, न आँखों में रहा पानी
बहुत बेचैन करता है रे! गांवों का शहर होना

जहां की निस्बतें हासिल मगर सुख-चैन के लाले
हजारों मर्ज देता है जियादा माल-अो-ज़र होना

हवाओं में घुटन, धरती के सीने में जहर क़ाबिज
कहाँ ले जाएगा हद से जियादा बेसबर होना

सॊ बार मरता हूँ

मैं उन्हीं आँखों में गहरे तक उतरता हूँ
सामना हो जाए तो जिनसे मुकरता हूँ

जानता हूँ अब वहाँ कोई नहीं फिर भी
उनकी गली से आज भी होकर गुजरता हूँ

वो मुझे इक रोज आकर के समेटेगा
बस इसी उम्मीद में अक्सर बिखरता हूँ

धमनियों में भी सुख़न ही दॊड़ता होगा
चार मिसरों पर अगर सॊ बार मरता हूँ

उनकी मर्जी है वो मुझको नजरंदाज करें
मैं तो अपनी हाथ लकीरों साथ ठहरता हूँ

लोग कहते हैं कि यूँ “आँसू” नहीं अच्छे
ऒर मैं कुछ कहकहों में भी सिहरता हूँ

क्या किया जाए

इल्म की पर्दानशीनी क्या किया जाए
अॊर दुनिया है मशीनी क्या किया जाए

दिन जहाँ पर ख्वाब के हुक्के भरे जाएं
ऒर रातें हों जमीनी क्या किया जाए

उम्र भर धोता रहा मैं दाग अपने जिस्म के
मन चदरियां हाय! झीनी क्या किया जाए

ज़ाहिदों की इंकलाबी सोच के परचम तले
अनपढ़ो की नुक्ताचीनी क्या किया जाए

फिर वही किस्सा कि मांझी से मुसाफिर ने
धार में पतवार छीनी क्या किया जाए

चार दिन हल्ला मचा था निर्भया के नाम पर
ऒर फिर बस तमाशबीनी क्या किया जाए

निर्भया के बाद भी

इन्कलाबी तख़्तियों का क्या किया जाए
सिर उठाती मुठ्ठियों का क्या किया जाए

जब जजों के फैसलों में भी निराशा साफ हो
गोलघर की चुप्पियों का क्या किया जाए

वे अखाड़े में रहें तो ताल भी ठोकें मगर
सिर्फ नूरा- कुश्तियों का क्या किया जाए

हां, यहाँ अपराधियों के भी कई अधिकार हैं
किन्तु बेबस बेटियों का क्या किया जाए

बात अपने पर गयी तो चुटकियों में फैसले
पर रिहा उन कैदियों का क्या किया जाए

निर्भया के बाद भी यदि हस्तिनापुर मॊन है
फिर सियासी पारियों का क्या किया जाए

मुस्कराएं हम

शर्त को इस तरह निभाएं हम
बस किनारे पर डूब जाएं हम

काम की बातें ख़ातिर जमा रखें
जब मिलें उनसे मुस्कराएं हम

तुम्हारे तर्जुमे गुमराह करते हैं
एक ‘सही’ सच ढूंढ़ लाएं हम

काम में मसरूफ कितने भी रहें
एक ख़त तो डाल आएं हम

शम्बूक वध भी राम के हाथों ?
अब तो इनसे बाज आएं हम