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तुम नहीं आयी

दीपेन्द्र के पिता को गुजरे चार साल हो चुके थे और उसकी इच्छा के विपरीत माँ अकेले ही गाँव में रहती थी। शुरू में तो दीपेन्द्र उन्हें अपने साथ दिल्ली ले आया था लेकिन माँ को वहां घुटन महसूस होती थी। तीन महीने में ही उनका मन उचट गया और वे गाँव जाने की जिद करने लगीं। हार कर दीपेन्द्र ने उन्हें इस शर्त पर गाँव पहुँचाया कि महीना डेढ़ महीना वहाँ रहकर वापस दिल्ली आ जायेंगी लेकिन माँ एक बार गाँव आयीं तो फिर वापस जाने का उन्होंने नाम ही नहीं लिया। टाल–मटोल का कोई न कोई बहाना हमेशा तैयार रहता था– कभी खेती–बाड़ी का काम, कभी मौसम का बहाना, कभी रिश्तेदारी में शादी–ब्याह…….हार कर दीपेन्द्र ने इस बार बिना पूछे ही टिकट करा लिया लेकिन कोहरे की वजह से गाड़ियाँ दस–दस घंटे की देरी से चल रही थीं और इस बार भी टिकट कैंसिल कराना पड़ा। चूँकि मैं उसका दोस्त था और वह मेरा काफी सम्मान भी करता था इसलिये यह जानकर कि मैं गाँव जा रहा हूँ,, उसने एक पैकेट देते हुए कहा–
‘हो सके तो मेरे गाँव जाकर मेरी माँ को दे देना।’
दीपेन्द्र से मेरी दोस्ती करीब दो–ढाई साल पुरानी है। शुरू की कुछ औपचारिक मुलाक़ातों के बाद मैंने महसूस किया कि वह बिल्कुल अलग तरह का इन्सान है– भीड़ भाड़ से दूर, कुछ खोया–खोया सा रहने वाला। पहले तो लगा कि वह बड़ा नीरस और घमंडी आदमी है किन्तु जल्दी ही मुझे अहसास हो गया कि वह एक अच्छा और संवेदनशील इन्सान है। कुछ खास था उसमें जिसे न जानते हुए भी मैं उसे पसंद करने लगा था।
दिसंबर में दिन वैसे ही काफी छोटे होते हैं। साधन न मिलने की आशंका लिये हुए मैं स्टेशन पर उतरा तो कोहरे ने अपना तम्बू गाड़ना शुरू कर दिया था। मैंने जल्दी से एक टेम्पू रिजर्व किया और पूछते–पाछते दीपेन्द्र के घर पहुँच गया। लोहे का मेनगेट खुला हुआ था और बारामदे में एक वृ द्धा बैठकर अंगीठी जला रही थी। इसके पहले कि मैं कुछ बोलूँ, वे ही बोल पड़ीं–
‘कौन ?……. राजेश ?’
‘जी…….’ निश्चय ही दीपेन्द्र ने माँ को खबर कर दी थी।
‘आओ, , अंदर आओ। मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी।’
उन्होंने बरामदे से लगा हुआ कमरा खोल दिया। कमरा साफ–सुथरा था लेकिन काफी दिनो से बंद रहने के कारण कुछ सीलन की गंध आ रही थी। कुछ संकोच को साथ मैंने खिड़कियाँ खोल दीं और हाथ मुँह धोने हैण्डपम्प के पास चला गया। वापस आाया तो स्टूल पर जलपान रखा हुआ था और माँ जी खिड़कियाँ बंद कर रही थीं–
‘बेटा सर्दी काफी है इसलिए…….’
‘मेरी गलती है माँ जी, मैं आकर बंद करने ही वाला था।’
‘अरे कोई बात नहीं बेटा।’
कुशल–क्षेम के बाद बातें शुरू हुयीं तो कब रात के नौ बज गये पता ही न चला। सिलसिला उन्होंने ही तोड़ा–
‘बेटा तुम फ्रेश हो लो मैं खाना ले आती हूँ।’
‘जी ठीक है।’
उनके जाने के बाद मैंने कमरे का मुआयना किया तो एक आलमारी में कुछ पुरानी किताबें रखी देखी। बहुत दिनो से किसी ने खोला नहीं था इसलिए उनपर धूल जमी हुयी थी। गम्भीर साहित्य में वैसे तो कोई खास दिलचस्पी नहीं है किन्तु कहानियाँ मुझे बहुत पसंद हैं। कुछ देर तक यूँ ही उलटने–पलटने के बद मेरी नजर सन 1930 में छपने वाली ‘चाँद’ नामक पत्रिका के संकलन पर पड़ी। पूरे वर्ष के अंकों को एकसाथ जिल्द कर दिया गया था।
मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।मैंने तुरन्त दीपेन्द्र को फोन मिलाया–
‘हेलो दीपेन्द्र, एक बेशकीमती खजाना मेरे हाथ लगा है।’
‘कौन सा खजाना भाई ? तुम माँ से मिलने गये हो या खजाना ढूँढ़ने ?’
‘पता है ? बिल्कुल एन्टीक पीस हाथ लगा है।’
‘अब बता भी दो।’
‘तुम्हारी अलमारी से आठ दशक पुरानी मैगजीन मिली है। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है।’
‘ओह हो, मैं तो भूल ही गया था।तुम उसे सम्भाल कर रख लेना और यहाँ ले आना।पुरानी यादें फिर से ताजा करेंगे ’
‘तुम मना करते तो भी ले आता। मेरी तो सारी थकान दूर हो गयी ।’
दीपेन्द्र अल्पभाषी था इसलिए बातें ज्यादा देर नहीं चलीं। खाना भी आ गया था । मैंने हाथ मुँह धोकर खाना खाया और सोने की तैयारी करने लगा। गांव में बिजली का आना परदेस की चिठ्ठी के समान होता है। अंधेरे की वजह से नींद ने कुछ जल्दी दस्तक दी और मैं सुकून की गहरी नींद सो गया। सुबह आँख खुली तो सूरज खिड़की के रास्ते कमरे में दाखिल हो चुका था। मैंने हड़बड़ी में तैयार होकर नाश्ता किया और नहर की पुलिया से शहर को लिये टेम्पू पकड़ लिया। दोपहर की ट्रेन में रिजर्वेशन था इसलिए देर करना उचित नहीं था।
रास्ते में अचानक मेरा ध्यान दीपेन्द्र की प्रतिक्रिया पर गया। किताब का नाम सुनकर कहीं गुम सा हो गया था वह। कहीं उसकी खामोशी, , उसकी वीरानगी का सम्बन्ध अतीत की किसी घटना से तो नहीं है ?
गाड़ी के आने में कुछ देर थी इसलिए मैंने किताब निकाल ली और सरसरी नजर से पढ़ने लगा। अचानक एक कागज किताब से निकलकर गिरा तो मेरा ध्यान उस पर गया। बहुत बारीक अक्षरों में लिखा हुआ कोई पत्र था । किसी और का पत्र पढ़ना शिष्टाचार के खिलाफ होता है इसलिए उसे मोड़कर रखने ही लगा था कि मेरी नजर ऊपर लिखे ‘कहानी’ पर गयी। समझ गया कि यह पत्र नहीं बल्कि कोई कहानी है। उत्सुकता और झिझक के मिले–जुले भावों को साथ मैंने पढ़ना शुरू किया–

प्रिय शालू,
दो साल बीत गये लेकिन तुम नहीं आयी। दो साल यानी चौबीस महीने। तीस दिन का महीना और चौबीस घण्टे का दिन। आह, अपने आप में कितनी रोमान्चकारी, कितनी हृदय द्रावक कल्पना। तुमने तो अगले ही दिन मिलने को कहा था। अगले दिन यानी बारह घण्टे बाद। मैं तुम्हारे सानिन्ध्य की कल्पना में डूबा तुम्हारे आगमन की प्रतीक्षा करता रहा किन्तु तुम नहीं आयी। शायद धूप ढलने पर आओ यह सोचकर मैं शाम का इन्तजार करने लगा। शाम हुयी और अंधेरा भी घिरने लगा किन्तु तुम फिर भी नहीं आयी। का एक–एक पल एक युग के समान था और मैं था कि असंख्य पलों को गुजरने के बावजूद निश्चल खड़ा था।
तुम कहोगी कि यह सब कल्पना है परन्तु यह कल्पना नहीं हक़ीकत है। तुम्हारी याद में जिया गया हर एक पल हक़ीकत की तस्वीर पेश कर रहा है। वह भी कैसी तस्वीर?…….एक महासमुद्र की। हाँ, तुम्हारी यादों के सभी पल एक स्थान पर एकत्र कर दिए जाएं तो एक समुद्र नहीं बन जाएगा? तुम्हारे साथ जिये गए क्षण जब भी याद आते थे उस समय की भावनाओम् का उठान क्या ज्वार नहीं कहलाएगा? फिर अगले पल इस बात का ध्यान आते ही कि तुम साथ नहीं हो, जब भावनाएं यथार्थ के धरातल पर उतरती थीं तो क्या उन्हें भाटा नहीं कहा जाएगा? कभी भूत का स्मरण, कभी वर्तमान का अनुभव और कभी भविष्य की कल्पना क्या विभिन्न आयामों की तरंगे न्ही हैं?
जानती हो ये दो वर्ष मैंने कैसे बिताये हैं? नहीं……. जानोगी भी कैसे? आखिर तुम ‘मैं जो नहीं। बीते हुए सात सौ तीस दिन एक पुजारी के रूप मैं बिताए हैं मैंने। सिर्फ तुम्हारा ध्यान करके। हंसोगी, और तुम्हीं क्या, सभी हंसेगे। आज की इस भागती हुयी दुनिया में कोई इतना मग्न कैसे हो सकता है? दिन–रात की बात छोड़ो, कोई नियम से रोज–रोज भी किसी को याद नहीं कर सकता लेकिन इस दौड़ में शामिल होकर भी मैंने किया है। विश्वास करो, मैंने रोज–रोज ही नहीं, हर पल तुम्हें चाहा है– खाते वक्त, सोते वक्त, जागते वक्त, भागते वक्त, कोई ऐसा काम तो नहीं है जब तुम याद न आती हो। पढ़ने बैठता हूं तो सोचता हूं कि काश तुम मेरे साथ बैठकर पढ़ती, खाने बैठता हूं तो सोचता हूं कि काश तुम मेरे साथ बैठकर खाती। यानी हर काम के समय यही ख्याल आता कि काश तुम मेरे साथ होती। सच तुम्हारे बिना ज़िन्दगी सूनी सी हो गयी है। कुछ अच्छा नहीं लगता।
शालू, तुमसे क्या रिश्ता है, मैं नहीं जानता। कहते हैं किसी को कोई सम्बोधन दे दो रिश्ता अपने आप मालूम हो जाएगा। परन्तु मैं तुम्हें आज तक कोई सम्बोधन नहीं दे सका। इसके लिए तुम मेरी वैचारिक अक्षमता को दोषी मान सकती हो। कभी–कभी सोचता हूं कि तुम्हें कोई सम्बोधन दे ही डालूं। लेकिन क्या?…….हर सम्बोधन की कुछ परिसीमाएं होती हैं और तुन्हें किसी सीमा में बांधना तुम्हारी विशेषताओं के साथ अन्याय होगा। तुम तो व्यापक हो, सार्वकालिक हो, जीवन के हर प्रवाह में तुम उपस्थित हो। जीवन के हर प्रवाह में तुम उपस्थित हो। सुख हो या दुख कोई स्थिति ऐसी नहीं है जब तुम्हारी यादें तुम्हारी प्रतिमूर्ति बनकर सहभागिता न दिखलाती हों।
पिछली गर्मियों में मैं नैनीताल गया था। तुम गयी हो कभी ?…….बड़ा मनोहारी वातावरण है वहां का। मैं तो खो सा गया था वहां। काठगोदाम से कुछ दूर एक बड़ा सा घास का मैदान है।वहीं पास में ही शायद सैलानियों के लिए लकड़ी के सात आठ काटेज बने हैं।वैसे वहां कोई था नहीं।मैं उसी मैदान में बैठकर एक गति लिखने की कोशिश कर रहा था लेकिन कुछ अच्च्छा बन नहीं पा रहा था।उसी समय मैंने एक युवक के साथ तुम्हें मैदान के दूसरी तरफ टहलते हुए देखा।हालांकि मेरी ओर तुम दोनो की पीठ थी और मैं दावा भी नहीं कर सकता था कि वह तुम्हीं थी फिर भी मेरे मन में एक ईष्र्या पनप ही गयी।तुम दोनो के बीच मैने कई रिश्ते क़ायम किए किन्तु मन किसी पर स्थिर न रह सका।रिश्ते का स्वरूप जानने नहीं, नैनीताल उस सुहावनी धरती पर तुम्हारा स्वागत करने।तुम कहोगी कि मैं कौन होता हूं तुम्हारा स्वागत करनेवाला, किन्तु मैं था।इसलिए था कि तुमसे पहले से उस मैदान में बैठने के कारण उसे अपना समझने लगा था।दस कदम का फासला तय करने में मुझे दस मिनट लगे।कदम तेजी से बढ़ते और थम जाते, यह सोचकर कि तुमसे मिलकर क्या कहूंगा, कैसे कहूंगा अपनी बात…….खैर मैं पहुंच ही गया तुम्हारे पास।खुशी के अतिरेक में मेरे मुंह से निकला–
‘शालू तुम…….’
शेष शब्द मेरे मुंह में ही रह गए।कारण? कारण कि वह तुम नहीं थी। टुम क्या तुम जैसी भी नहीं थी। पीछे से देखकर मैंने कैसे उसे ‘तुम’ समझ लिया, मैं स्वयं नहीं समझ पाता।शायद इसके पीछे मरिा तुममय हो जाना ही था।मेरा मुंह शर्म के मारे लाल हो गया और मैं सिर नहीं उठा पा रहा था।युवती शायद मेरी मनोदशा समझ गयी थी।उसने कहा–‘कोई बात नहीं, ऐसा हो जाता है।’
वह दिन नहीं मैं भुलाए नहीं भूलता और जब जब वह घटना याद आती है तुम रोज से कुछ ज्यादा याद आती हो।
तुम कब मुझसे मिलोगी मैं नहीं जानता।मिलोगी भी या नहीं यह भी नहीं कह सकता।फिर भी बीते हुएदिनों की यादें मेरे लिये संजीवनी का कार्य करताी हैं।
म्ंोरे सामने रहने वाली लड़की जब भी अपने भीगे हुए बालों को छत पर खड़ी होकर गुलाबी कंघी से संवारती है, तुम मुझे बहुत याद आती हो।उसे देखकर याद आ जाते हैं वे दिन जब तुम आँगन में खड़ी होकर अपने भीगे हुए रेशमी बालों को गुलाबी कंघी से संवारा करती थी।बालों की झिरी से झाँकती हुयी तुम्हारे मुस्कराते हुए होठों की बिजली मेरे दिल में एक नयी उमंग भर देती है और मैं उन स्वर्णिम दिनों की याद करके एक और जिन्दगी जी लेता हूँ।मैं जानता हूँ कि वह मुझे दृष्टिलोलुप समझती है।मैं अपनी इस छवि को बदलना भी चाहता हूँ किन्तु बीते हुए दिनों की जीवन्त याद एक बार फिर उसकी ओर देखने को विवश कर देती है।
कभी–कभी तो इन्तिहाँ हो जाती है।एक बार मेरे घर पर कुछ मेहमान आए हुए थे।बहुरा, एक ऐसा त्योहार जिस दिन कुंवारी लड़कियाँ व्रत रखती हैं और हाथों में मेंहदी लगाती हैं, का दिन था अतÁ सभी लड़कियों ने मेंहदी रचा रखी थी।मेंहदी रचाने वालियों में मेरे पड़ोस की राधा भी थी।मैं कहीं से घूम फिर कर आया और उसके हाथों की मेंहदी को देखकर चौंक उठा।मेंहदी की डिजाइन हू–ब–हू वैसी ही थी जैसी कि उस दिन तुमने रचा रखी थी। मैं समझा कि तुम आ गयी हो और मेरा मन अवश हो गया।मैं आहिस्ते से बोल पड़ा–
‘शालू तुम यहाँ?’
राधा ने मेरे चेहरे को देखा लेकिन मैं तो उसके हाथों को देख रहा था।होठ बुदबुदा उठे–
‘मैं पहचान गया शालू ऐसी डिजाइन तुम्हारे सिवा कोई और बना ही नहीं सकता।सच, मुझे आज फिर वही दिन याद आर हा है…….’ राधा ने शरमाकर सिर झुका लिया लेकिन बिना उसके चेहरे को देखे मैं अपनी ही रौ में कहता गया–‘…….जब तुमने अपने हाथों में बड़े परिश्रम से मेंहदी रचाई थी।हाथों से तुम कुछ उठा नहीं सकती थी और दुपट्टा था कि बार–बार सरक जा रहा था।लाज से बोझल तुम्हारी पलकों का बार–बार उठकर गिरना और बडे. यत्न से रचाई गयी मेंहदी को बिगड़ने से बचाने की कशमकश मुझे अब भी याद है।उस समय के तुम्हारे चेहरे के भाव मुझे आज भी उद्वेलित कर रहे हैं……. और आज तुमने फिर मेंहदी रचायी?……. आते ही पुरानी यादोम् को ताजा करने के लिए ?……. तुम धन्य हो शालू, तुम धन्य हो।उस दिन तो मैं कुछ कहने का साहस न जुटा सका लेकिन आज इन हाथों को जरूर चूमूंगा …….’ कहकर मैने ज्यों ही उसका हाथ पकड़ना चाहा, उसने झटके से हाथ खींच लिया।मैंने आश्चर्यचकित होकर जब उसके चेहरे पर नजर डाली तो मेरी क्या दशा हुयी यह सोच सकती हो।उसी दिन मुझे अपनी दीवानगी का सही अंदाजा हुआ। उसी दिन मैने जाना कि आदमी का अचेतन मन क्या क्या गुल खिला सकता है।
कभी कभी सोचता हूँ तो बड़ा आश्चर्य होता है।तुम्हारे साथ रहने की खुशी की अपेक्षा तुम्हारे इन्तजार के ग़म ने मझे अधिक समृद्ध बनाया है।उन दिनो सिर्फ खुशी ही खुशी थी।प्रेम के गीत लिखता था और फिर खुश होता था।परन्तु आज तो बात ही अलग है।तुमसे काल्पनिक मिलन की खुशी और यथार्थ विछोह का दुख मरे गीतों में बराबर की हिस्सेदारी रखते हैं।आज तो दोगुने अहसास हैं, दोगुनी खुशियां हैं, दोगुने ग़म।
शालू, अगर तुम्हें मेरी याद आए तो परेशान मत होना।हर अच्छी–बुरी चीज में से कुछ अच्छा तलाश कर लेना मेरी विशेषता है, मेरा शौक है।अगर तुम्हारी यादों के समन्दर में से चुन सका तो ठीक है,और न तलाश सका तो भी थकूँगा नहीं।मीनार की शमा को देखकर ही ये गरीब अपनी सारी रात गुजार देगा।
शालू, तुम बोर तो नहीं हो रही हो? होगी भी क्यों नहीं।एक ही बात को बार–बार कहकर मैं भी तो बोरियत का ही सामान कर रहा हूँ।पता नहीं तुम्हारे पास समय हो या न हो लेकिन मैं अपना राग अलापे जा रहा हूँ।पता नहीं यह ख़त तुम्हें मिले या न मिले परन्तु इतना तो है ही कि इसी बहाने मरी फाइल में एक और ख़त तो बढ़ ही जाएगा……अच्छा अब समाप्त करता हूँ, तुम जहाँ भी रहो खुश रहो।
तुम्हारा, सदैव तुम्हारा–
‘दीप’
23 मई 1992
पत्र समाप्त करके मैंने एक गहरी सांस ली। अब मेरी समझ में कुछ–कुछ आ रहा था।