Category Archives: नवगीत

अपने पर को तोल रहा हूँ

मन ही मन कुछ बोल रहा हूँ
अपने पर को तोल रहा हूँ

अब टूटी तब टूटी डाली
बियाबान सा जंगल खाली
दूर क्षितिज तक धुअाँ धुआँ है
ऒर गिरह भी खाली खाली
नये ठॊर की खोज खबर में/ यायावर सा डोल रहा हूँ

नये दौर की नयी चुनौती
पाले बदल रही अपनौती
कदम-कदम पर उल्टी गंगा
मन चंगा पर कहाँ कठॊती
अनुमानों पर नजर गड़ाए / मुनरी मुनरी बोल रहा हूँ

कभी गाँव में कभी शहर में
कभी भागते महानगर में
निश्चय के हर तीर तिरोहित
अागा-पीछा, अगर-मगर में
अवसर बीत गये, पछिताए / खाली तरकस तोल रहा हूँ

मन उजियार करें

मन उजियार करें
निपट अकेलेपन का मिलजुल कर प्रतिकार करें

जितनी पाँखें फैलाता हूँ
अंदर कहीं सिमट जाता हूँ
मृग मरीचिका मन के अंदर
चलते-चलते थक जाता हूँ
कठिन मरूस्थल है पर, जीवन का त्यौहार करें

जब से उनके पांव पड़े हैं
दीवारों के कान खड़े हैं
अनुमानों की धमाचॊकड़ी
संशय सीना तान खड़े हैं
भला संयमित, मर्यादित कैसे व्यवहार करें

हम बंजारे महानगर में
रोजी- रोटी के चक्कर में
विश्वामित्रों से हठ करते
कभी पार तो कभी अधर में
सतत संतुलन बैठाते हम बारम्बार मरें

अनवरत चलता रहा हूँ

अनवरत चलता रहा हूँ
याचना का धुर विरोधी यातना सहता रहा हूँ

कॊन चाहेगा कोई बांहें मरोड़े
पर समय ने भी कहाँ हथियार छोड़े
भूख के हाथों पराजित आज तक दबता रहा हूँ

लांघ कर सच की सुरक्षित देहरी
एक मृगतृष्णा लिए यायावरी
पांव में छाले लपेटे यंत्रवत चलता रहा हूँ

धर्म की मीमांसाओं से बचाकर
तामसी आकांक्षाओं को दबाकर
कर्म से बांधे स्वयं को स्वयं ही छलता रहा हूँ

खोखले आडंबरों का बंधुआ हूँ
अपने ही कांधे रखा कोई जुआ हूँ
नित नयी अवमानना का सामना करता रहा हूँ

ढूँढ़ता हूँ नित नयी सम्भावनाएं
रास्ता रोके खड़ीं पर वर्जनाएं
सर्जनाओं के शिविर में पीर सा पलता रहा हूँ

गीत फिर लिक्खूँ

सोचताहूँ- सोचता ही रह न जाऊँ
कुछ नहीं तो वेदनायें गुनगुनाऊँ

गीत फिर लिक्खूँ
समय की देहरी पर
सो न जाऊँ
शब्द के जंगल चलूँ
धूनी रमाऊँ
अर्थ की फुनगी टंगी संवेदनाएँ
पीर की टहनी झुकाऊँ, तोड़ लाऊं

तितलियां पकड़ूँ
परागों की चमक से
उंगलियां भर लूँ
जुगनुअों के घर चलूँ
दो मट्ठियां भर लूँ
छोड़ दूँ उनको मेरे मन के तिमिर में
ऒर बच्चों की तरह मैं खिलखिलाऊँ

चिट्ठियां लिक्खूँ
शिकायत के शहर गुम
हो न जाऊँ
मुख्यधारा में चलूँ, पर
खो न जाऊँ
बेमियादी चुप्पियाँ चुभने लगी हैं
चाहता हूँ दो कड़ी बस गुनगुनाऊँ

चुपके-चुपके मैं बहता हूं

चुपके-चुपके मैं बहता हूं ।
अंदर-अंदर दर्द समन्दर
उथल-पुथल होता रहता हूं।

कई ऋणों के बोझ तले मैं बाधाओं से गले मिला हूं
मंदिर-मंदिर निर्वासन था जंगल-जंगल पांव छिला हूं
कर्तव्यों की शर शय्या पर
पड़ा-पड़ा रिसता रहता हूं।

कुछ गुब्बारे उत्सवधर्मी कुछ के नाम वही बेशर्मी
संसाधन तो सहमे सिकुड़े पर इच्छाओं की हठधर्मी
खुद से खुद ही बातें करता
थोड़ा गुमसुम सा रहता हूं।

मैं तो समझूं पीर-पराई रोग-व्याधियों की पहुनाई
संबंधों के बियाबान में साथ खड़ी केवल परछाई
फिर भी उनकी बारहखड़ियां
थोड़ी कही बहुत सुनता हूं।

इनकी, उनकी, सबकी बातें आंखों-अखों कटती रातें
करवट-करवट खालीपन है सलवट-सलवट गहरी सांसें
चेहरे पर झीनी,झूठी सी
मुस्काने अोढ़े फिरता हूं।