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अपने पर को तोल रहा हूँ

मन ही मन कुछ बोल रहा हूँ
अपने पर को तोल रहा हूँ

अब टूटी तब टूटी डाली
बियाबान सा जंगल खाली
दूर क्षितिज तक धुअाँ धुआँ है
ऒर गिरह भी खाली खाली
नये ठॊर की खोज खबर में/ यायावर सा डोल रहा हूँ

नये दौर की नयी चुनौती
पाले बदल रही अपनौती
कदम-कदम पर उल्टी गंगा
मन चंगा पर कहाँ कठॊती
अनुमानों पर नजर गड़ाए / मुनरी मुनरी बोल रहा हूँ

कभी गाँव में कभी शहर में
कभी भागते महानगर में
निश्चय के हर तीर तिरोहित
अागा-पीछा, अगर-मगर में
अवसर बीत गये, पछिताए / खाली तरकस तोल रहा हूँ

हवा से बाख़बर होना

इसे तुम अफसरी कह लो या मेरा घरबदर होना
कहाँ आसान होता है हवा से बाख़बर होना

जरा थम कर बयाबां में हक़ीकत को बयां करना
कि महसूसा है मैंने क़ातिलों का हमसफर होना

न धरती पर, न चेहरों पर, न आँखों में रहा पानी
बहुत बेचैन करता है रे! गांवों का शहर होना

जहां की निस्बतें हासिल मगर सुख-चैन के लाले
हजारों मर्ज देता है जियादा माल-अो-ज़र होना

हवाओं में घुटन, धरती के सीने में जहर क़ाबिज
कहाँ ले जाएगा हद से जियादा बेसबर होना

संक्षिप्त परिचय

नाम:- विजय प्रताप “आँसू”
संपर्क:- 244/1, आदर्श नगर,
न्यू रेलवे रोड, गुड़गाँव-122001
ई-मेल:- pratapvijai70@gmail.com
जन्म:- 1 फरवरी 1970, बलिया जिले के डूहीमूसी गांव में
शिक्षा:- सिविल इन्जीनियरिंग में स्नातक
सम्प्रति:- डी.एल.एफ.लिमिटेड गुड़गाँव में कार्यरत

मन उजियार करें

मन उजियार करें
निपट अकेलेपन का मिलजुल कर प्रतिकार करें

जितनी पाँखें फैलाता हूँ
अंदर कहीं सिमट जाता हूँ
मृग मरीचिका मन के अंदर
चलते-चलते थक जाता हूँ
कठिन मरूस्थल है पर, जीवन का त्यौहार करें

जब से उनके पांव पड़े हैं
दीवारों के कान खड़े हैं
अनुमानों की धमाचॊकड़ी
संशय सीना तान खड़े हैं
भला संयमित, मर्यादित कैसे व्यवहार करें

हम बंजारे महानगर में
रोजी- रोटी के चक्कर में
विश्वामित्रों से हठ करते
कभी पार तो कभी अधर में
सतत संतुलन बैठाते हम बारम्बार मरें

अनवरत चलता रहा हूँ

अनवरत चलता रहा हूँ
याचना का धुर विरोधी यातना सहता रहा हूँ

कॊन चाहेगा कोई बांहें मरोड़े
पर समय ने भी कहाँ हथियार छोड़े
भूख के हाथों पराजित आज तक दबता रहा हूँ

लांघ कर सच की सुरक्षित देहरी
एक मृगतृष्णा लिए यायावरी
पांव में छाले लपेटे यंत्रवत चलता रहा हूँ

धर्म की मीमांसाओं से बचाकर
तामसी आकांक्षाओं को दबाकर
कर्म से बांधे स्वयं को स्वयं ही छलता रहा हूँ

खोखले आडंबरों का बंधुआ हूँ
अपने ही कांधे रखा कोई जुआ हूँ
नित नयी अवमानना का सामना करता रहा हूँ

ढूँढ़ता हूँ नित नयी सम्भावनाएं
रास्ता रोके खड़ीं पर वर्जनाएं
सर्जनाओं के शिविर में पीर सा पलता रहा हूँ