अपने पर को तोल रहा हूँ

मन ही मन कुछ बोल रहा हूँ
अपने पर को तोल रहा हूँ

अब टूटी तब टूटी डाली
बियाबान सा जंगल खाली
दूर क्षितिज तक धुअाँ धुआँ है
ऒर गिरह भी खाली खाली
नये ठॊर की खोज खबर में/ यायावर सा डोल रहा हूँ

नये दौर की नयी चुनौती
पाले बदल रही अपनौती
कदम-कदम पर उल्टी गंगा
मन चंगा पर कहाँ कठॊती
अनुमानों पर नजर गड़ाए / मुनरी मुनरी बोल रहा हूँ

कभी गाँव में कभी शहर में
कभी भागते महानगर में
निश्चय के हर तीर तिरोहित
अागा-पीछा, अगर-मगर में
अवसर बीत गये, पछिताए / खाली तरकस तोल रहा हूँ

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