Monthly Archives: December 2016

अपने पर को तोल रहा हूँ

मन ही मन कुछ बोल रहा हूँ
अपने पर को तोल रहा हूँ

अब टूटी तब टूटी डाली
बियाबान सा जंगल खाली
दूर क्षितिज तक धुअाँ धुआँ है
ऒर गिरह भी खाली खाली
नये ठॊर की खोज खबर में/ यायावर सा डोल रहा हूँ

नये दौर की नयी चुनौती
पाले बदल रही अपनौती
कदम-कदम पर उल्टी गंगा
मन चंगा पर कहाँ कठॊती
अनुमानों पर नजर गड़ाए / मुनरी मुनरी बोल रहा हूँ

कभी गाँव में कभी शहर में
कभी भागते महानगर में
निश्चय के हर तीर तिरोहित
अागा-पीछा, अगर-मगर में
अवसर बीत गये, पछिताए / खाली तरकस तोल रहा हूँ