मन उजियार करें

मन उजियार करें
निपट अकेलेपन का मिलजुल कर प्रतिकार करें

जितनी पाँखें फैलाता हूँ
अंदर कहीं सिमट जाता हूँ
मृग मरीचिका मन के अंदर
चलते-चलते थक जाता हूँ
कठिन मरूस्थल है पर, जीवन का त्यौहार करें

जब से उनके पांव पड़े हैं
दीवारों के कान खड़े हैं
अनुमानों की धमाचॊकड़ी
संशय सीना तान खड़े हैं
भला संयमित, मर्यादित कैसे व्यवहार करें

हम बंजारे महानगर में
रोजी- रोटी के चक्कर में
विश्वामित्रों से हठ करते
कभी पार तो कभी अधर में
सतत संतुलन बैठाते हम बारम्बार मरें

2 thoughts on “मन उजियार करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *