अनवरत चलता रहा हूँ

अनवरत चलता रहा हूँ
याचना का धुर विरोधी यातना सहता रहा हूँ

कॊन चाहेगा कोई बांहें मरोड़े
पर समय ने भी कहाँ हथियार छोड़े
भूख के हाथों पराजित आज तक दबता रहा हूँ

लांघ कर सच की सुरक्षित देहरी
एक मृगतृष्णा लिए यायावरी
पांव में छाले लपेटे यंत्रवत चलता रहा हूँ

धर्म की मीमांसाओं से बचाकर
तामसी आकांक्षाओं को दबाकर
कर्म से बांधे स्वयं को स्वयं ही छलता रहा हूँ

खोखले आडंबरों का बंधुआ हूँ
अपने ही कांधे रखा कोई जुआ हूँ
नित नयी अवमानना का सामना करता रहा हूँ

ढूँढ़ता हूँ नित नयी सम्भावनाएं
रास्ता रोके खड़ीं पर वर्जनाएं
सर्जनाओं के शिविर में पीर सा पलता रहा हूँ

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