गीत फिर लिक्खूँ

सोचताहूँ- सोचता ही रह न जाऊँ
कुछ नहीं तो वेदनायें गुनगुनाऊँ

गीत फिर लिक्खूँ
समय की देहरी पर
सो न जाऊँ
शब्द के जंगल चलूँ
धूनी रमाऊँ
अर्थ की फुनगी टंगी संवेदनाएँ
पीर की टहनी झुकाऊँ, तोड़ लाऊं

तितलियां पकड़ूँ
परागों की चमक से
उंगलियां भर लूँ
जुगनुअों के घर चलूँ
दो मट्ठियां भर लूँ
छोड़ दूँ उनको मेरे मन के तिमिर में
ऒर बच्चों की तरह मैं खिलखिलाऊँ

चिट्ठियां लिक्खूँ
शिकायत के शहर गुम
हो न जाऊँ
मुख्यधारा में चलूँ, पर
खो न जाऊँ
बेमियादी चुप्पियाँ चुभने लगी हैं
चाहता हूँ दो कड़ी बस गुनगुनाऊँ

2 thoughts on “गीत फिर लिक्खूँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *