सॊ बार मरता हूँ

मैं उन्हीं आँखों में गहरे तक उतरता हूँ
सामना हो जाए तो जिनसे मुकरता हूँ

जानता हूँ अब वहाँ कोई नहीं फिर भी
उनकी गली से आज भी होकर गुजरता हूँ

वो मुझे इक रोज आकर के समेटेगा
बस इसी उम्मीद में अक्सर बिखरता हूँ

धमनियों में भी सुख़न ही दॊड़ता होगा
चार मिसरों पर अगर सॊ बार मरता हूँ

उनकी मर्जी है वो मुझको नजरंदाज करें
मैं तो अपनी हाथ लकीरों साथ ठहरता हूँ

लोग कहते हैं कि यूँ “आँसू” नहीं अच्छे
ऒर मैं कुछ कहकहों में भी सिहरता हूँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *