Monthly Archives: May 2016

सॊ बार मरता हूँ

मैं उन्हीं आँखों में गहरे तक उतरता हूँ
सामना हो जाए तो जिनसे मुकरता हूँ

जानता हूँ अब वहाँ कोई नहीं फिर भी
उनकी गली से आज भी होकर गुजरता हूँ

वो मुझे इक रोज आकर के समेटेगा
बस इसी उम्मीद में अक्सर बिखरता हूँ

धमनियों में भी सुख़न ही दॊड़ता होगा
चार मिसरों पर अगर सॊ बार मरता हूँ

उनकी मर्जी है वो मुझको नजरंदाज करें
मैं तो अपनी हाथ लकीरों साथ ठहरता हूँ

लोग कहते हैं कि यूँ “आँसू” नहीं अच्छे
ऒर मैं कुछ कहकहों में भी सिहरता हूँ