क्या किया जाए

इल्म की पर्दानशीनी क्या किया जाए
अॊर दुनिया है मशीनी क्या किया जाए

दिन जहाँ पर ख्वाब के हुक्के भरे जाएं
ऒर रातें हों जमीनी क्या किया जाए

उम्र भर धोता रहा मैं दाग अपने जिस्म के
मन चदरियां हाय! झीनी क्या किया जाए

ज़ाहिदों की इंकलाबी सोच के परचम तले
अनपढ़ो की नुक्ताचीनी क्या किया जाए

फिर वही किस्सा कि मांझी से मुसाफिर ने
धार में पतवार छीनी क्या किया जाए

चार दिन हल्ला मचा था निर्भया के नाम पर
ऒर फिर बस तमाशबीनी क्या किया जाए

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