पंख फड़फड़ाता हूँ

जब भी खुद के करीब आता हूँ
पंख मैं खूब फड़फड़ाता हूँ

कॊन जाएगा उंगलियाँ थामे
राह चलते मैं डगमगाता हूँ

शाम होते ही अपनी मंज़िल की
आज भी राह भूल जाता हूं

भीड़ के बीच भी रहा तनहा
जाने किससे मैं ख़ॊफ खाता हूँ

साथ जिनके मैं बैठता-उठता
बात करता हूँ सकपकाता हूँ

हर गली, हर शहर- नुमाइश है
मैं ही अहमक हूँ जो छुपाता हूँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *