सवाल उठाती है ज़िन्दगी

उनके ही तख़्तो-ताज सजाती है ज़िन्दग़ी
जिनके हजारों नाज उठाती है ज़िन्दगी

जिन्दा हूं मैं, सुकून भी है शहर-ए-यार में
फिर भी कई सवाल उठाती है ज़िन्दगी

तेरे शहर में आज भी ख़ानाबदोश हूं
वैसे बड़े मकान बनाती है ज़िन्दगी

उनकी नजर पड़ी तो शहंशाह हो गया
वरना फ़क़त उधार चुकाती है ज़िन्दगी

लोगों के ऐतबार का शायद सवाल था
वरना कहाँ हिसाब चुकाती है ज़िन्दगी

यह जिन्न भी चिराग से निकलेगा एक दिन
वादों की अब मियाद बढ़ाती है ज़िन्दग़ी

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