Monthly Archives: November 2015

मुस्कराएं हम

शर्त को इस तरह निभाएं हम
बस किनारे पर डूब जाएं हम

काम की बातें ख़ातिर जमा रखें
जब मिलें उनसे मुस्कराएं हम

तुम्हारे तर्जुमे गुमराह करते हैं
एक ‘सही’ सच ढूंढ़ लाएं हम

काम में मसरूफ कितने भी रहें
एक ख़त तो डाल आएं हम

शम्बूक वध भी राम के हाथों ?
अब तो इनसे बाज आएं हम

पंख फड़फड़ाता हूँ

जब भी खुद के करीब आता हूँ
पंख मैं खूब फड़फड़ाता हूँ

कॊन जाएगा उंगलियाँ थामे
राह चलते मैं डगमगाता हूँ

शाम होते ही अपनी मंज़िल की
आज भी राह भूल जाता हूं

भीड़ के बीच भी रहा तनहा
जाने किससे मैं ख़ॊफ खाता हूँ

साथ जिनके मैं बैठता-उठता
बात करता हूँ सकपकाता हूँ

हर गली, हर शहर- नुमाइश है
मैं ही अहमक हूँ जो छुपाता हूँ

सवाल उठाती है ज़िन्दगी

उनके ही तख़्तो-ताज सजाती है ज़िन्दग़ी
जिनके हजारों नाज उठाती है ज़िन्दगी

जिन्दा हूं मैं, सुकून भी है शहर-ए-यार में
फिर भी कई सवाल उठाती है ज़िन्दगी

तेरे शहर में आज भी ख़ानाबदोश हूं
वैसे बड़े मकान बनाती है ज़िन्दगी

उनकी नजर पड़ी तो शहंशाह हो गया
वरना फ़क़त उधार चुकाती है ज़िन्दगी

लोगों के ऐतबार का शायद सवाल था
वरना कहाँ हिसाब चुकाती है ज़िन्दगी

यह जिन्न भी चिराग से निकलेगा एक दिन
वादों की अब मियाद बढ़ाती है ज़िन्दग़ी