Monthly Archives: August 2015

कुछ कमाल होने दो

आज फिर कुछ कमाल होने दो
दर्द को बेमिसाल होने दो

पैरोकारी कमाल की उनकी
मुल्जिमों को बहाल होने दो

बेताल कब तक डाल पर होगा
विक्रमों से सवाल होने दो

पांव उनके जमीन पर होंगे
जीत को चार साल होने दो

जनता कब जनार्दन होगी
हुजूर से यह सवाल होने दो

वक्त सा हुनर दे दो

मेरी यादों को इक सफर दे दो
फिर कोई दर्द मुख्तसर दे दो

कुछ चिराग़ों ने सर उठाया है
फिर हवाओं को ये ख़बर दे दो

थक चुका हूँ मैं दर–ब–दर होते
अब तो अपना सा एक घर दे दो

जख्म सारे जहाँ के भर पाऊँ
मुझको भी वक्त सा हुनर दे दो

कोइ बीमार अब न हो ‘आँसू’
बस दुआओं में ये असर दे दो