चुपके-चुपके मैं बहता हूं

चुपके-चुपके मैं बहता हूं ।
अंदर-अंदर दर्द समन्दर
उथल-पुथल होता रहता हूं।

कई ऋणों के बोझ तले मैं बाधाओं से गले मिला हूं
मंदिर-मंदिर निर्वासन था जंगल-जंगल पांव छिला हूं
कर्तव्यों की शर शय्या पर
पड़ा-पड़ा रिसता रहता हूं।

कुछ गुब्बारे उत्सवधर्मी कुछ के नाम वही बेशर्मी
संसाधन तो सहमे सिकुड़े पर इच्छाओं की हठधर्मी
खुद से खुद ही बातें करता
थोड़ा गुमसुम सा रहता हूं।

मैं तो समझूं पीर-पराई रोग-व्याधियों की पहुनाई
संबंधों के बियाबान में साथ खड़ी केवल परछाई
फिर भी उनकी बारहखड़ियां
थोड़ी कही बहुत सुनता हूं।

इनकी, उनकी, सबकी बातें आंखों-अखों कटती रातें
करवट-करवट खालीपन है सलवट-सलवट गहरी सांसें
चेहरे पर झीनी,झूठी सी
मुस्काने अोढ़े फिरता हूं।

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