Monthly Archives: January 2015

आँख में झाँको

दबेगा सहेगा टूट जाएगा
मगर आदमी है छटपटाएगा

अगर शक़ है तो आँख में झाँको
अगर मुजरिम है तो सकपकाएगा

आज़ादी जब जब सर उठाएगी
पिंजरे का पंछी फड़फड़ाएगा

सिर्फ हासिलों पर मत रहो वरना
आपका गणित भी गड़बड़ाएगा

सर बुलन्द कर गया

शाइस्तगी से दर्द सर बुलन्द कर गया
अपने ही घर में हमको नज़रबन्द कर गया

चेहरे की झुर्रियों में हर रोज़ वो नया
फ़िक्र का अशार कलमबन्द कर गया

शानों में उस ग़ुमान की ताक़त नहीं रही
जब से वो हर सवाल मुहरबन्द कर गया

जिसने बदल के रख दिए जीने के मायने
मैं फिर वही मलाल बहरबन्द कर गया

साँसों में इतमिनान की ख़ुशबू सहेजकर
वो कौन ज़िन्दगी को हुनरमन्द कर गया

फिर वही कंकर

फिर उसी ख़ामोश पानी में वही कंकर
आज फिर शायद क़यामत का इरादा है

शर्म पर चिलमन, तबस्सुम पर सितम आखिर
किस अदावत की रवायत का इरादा है

जानता हूँ इश्क़ में सौदे नहीं होते
फिर भी ख्वाबों की तिजारत का इरादा है

चाँद को छूने चला था उस परिन्दे का
शौक़ की शह पर शहादत का इरादा है

दर्द की तासीर को जो चाशनी कर दे
उस कीमियागर की वकालत का इरादा है।

कुछ साजिशों से जंग है

कुछ साजिशों से जंग है डटकर निभाते जाइये
कुछ नहीं तो हाशिए पर घर बनाते जाइए

उनके हक़ में फैसले लेते रहेंगे हुक्मरां
आप अपना फलसफा कहते-सुनाते जाइए

हादसों के काफ़िले अॊर उम्र का लम्बा सफ़र
ज़िन्दगी कट जाएगी कुछ गुनगुनाते जाइए

फ़र्ज का परचम यक़ीनन कुछ बुलंदी पाएगा
जाहिदों के जख्म पर मरहम लगाते जाइए

कौन कहता है भगीरथ आ नहीं सकता यहाँ
आप भरसक प्यार की गंगा बहाते जाइये

उस ख़ुमार की

कानो में तेरे पांव की आहट कलामयी !
अब तक सुना रही हॆ ग़ज़ल उस ख़ुमार की

सांसें भी बंद मुट्ठियों में रेत की तरह
फिसली ही जा रही हॆ ग़ज़ल इंतजार की

शानों में सनसनाहटें हॆं ‘रॆक्व ‘ की तरह
शायद तेरी छुअन की कसक बेशुमार सी

वो सिरफिरी हवा दुपट्टा उड़ा गयी
आंखों में शर्म घोल गयी मेरे यार की

होठों की थरथराहटों का जो तर्जुमा करे
सालों से बस तलाश हॆ उस रहगुजार की