Monthly Archives: January 2015

सच कहता हूँ

सच कहता हूँ
पर कहने से डरता भी हूँ।

कुछ दीवारें चुपके–चुपके
अनुमानों से छुपते–छुपते
कानाफूसी खेल न खेलें
हाँ, यह सोच सिहरता भी हूँ।
सच कहता हूँ पर कहने से डरता भी हूँ।

सत्ता रोज बदलती भाषा
गढ़ती नई–नई परिभाषा
राजनीति के गलियारों में
गिरता और संभलता भी हूँ।
सच कहता हूँ पर कहने से डरता भी हूँ.।

कुछ मायावी रिश्ते–नाते
मन में आस जगाते जाते
अहसासों के महाभँवर में
फँसता और निकलता भी हूँ।
सच कहता हूँ पर कहने से डरता भी हूँ.।

अरमानो की गहमागहमी
मर्यादाएं सहमी सहमी
मध्यस्थों की दोहरी बातें
सुनकर जरा ठहरता भी हूं।
सच कहता हूँ पर कहने से डरता भी हूँ.।

ये निरा अकेलापन

बेध बेध जाता है
ये निरा अकेलापन।

मन भाये मीत कुछ, अन गाये गीत कुछ
चेतना की कोठरी में सेंध जब लगाते हैं
आँसुओं की पोटरी में छेद कुछ बनाते हैं
और बेध जाता है शाम का सवेरापन।
ये निरा अकेलापन।

रात के अँधेरे में, चाँदनी के डेरे में
पुरवईया बाँसुरिया प्रेम–धुन सुनाती है
साँस मेरी बावरिया दर्द गुनगुनाती है
और जागते दृगों में स्वप्न का बसेरापन।
ये निरा अकेलापन।

एक गीत प्यार का, फागुनी बयार का
एक कड़ी ही सही कोई तो सुनाएगा
मछियारी साँसों को ओस ही पिलाएगा
और बीत जाएगा दर्द का घनेरापन।
ये निरा अकेलापन।

शब्द गुम होते गये

शब्द गुम होते गये।

भीड़ के विस्तार के संग प्रीत की बढ़ती पिपासा
वर्जनाओं के शहर में वेधती पल पल निराशा
यत्न की मुठ्ठी सहेजी रेत तुम होते गये।
शब्द गुम होते गये।

आँख तकती ही रही कब शाम होगी,रात होगी
तप्त दोपहरी ढलेगी चाँदनीसे बात होगी
चेतना की अँजुरियों के छिद्र तुम होते गये
शब्द गुम होते गये।

जंगलों के नाम पर कुछ लोग यूकेलिप्टसी
पल रहे कुछ भाव हरियाली लपेटे कैक्टसी
आस मंजूषा में रखे वेद तुम होते गये।
शब्द गुम होते गये।

आइये मिल बैठ कर हम ज़िन्दगी को गुनगुनायें
हाथियों के पाँव से हम चींटियाँ कुछ तो बचायें
आज बेचैनी में कैसे मौन तुम होते गये?
शब्द गुम होते गये।

आदतें उनकी पुलिसिया

प्रश्न जब बहुरूपिया महसूसिए
आप उत्तर भेदिये सा दीजिए

जब दिये का तेल चुकने जा रहा हो
जुगनुओं से मुठ्ठियाँ भर लीजिए

आदतें उनकी पुलिसिया हो गईं
आप हिम्मत मीडिया सी कीजिए

आपने हर पेज पर परदा लिखा
हाशियों को झाँकने भी दीजिए

आपकी चुप्पी भुनाई जाएगी
वक्त रहते मुठ्ठियाँ कस लीजिए

रहनुमाओं पर भरोसा कर चुके
अब हमें कुछ और करने दीजिए

गवाहों से राफ़ता रखना

फिर अदालत में उनकी पेशी है
तुम गवाहों से राफ़ता रखना

वो ग़ुनाहों की क़ब्र खोदेंगे
तुम निगाहों पे निगहबाँ रखना

ये सियासत है इसमें तब आना
जब उसूलों को अलविदा कहना

कुछ हवाओं ने मंत्र फूँका है
हुक्मरानो को ही ख़ुदा कहना

हार मानेगे परखने वाले
अपने सोने को बस खरा रखना